Tuesday, January 31, 2017

आदिवासी हिन्दू नहीं है

८ फरवरी को म. प्र. के आदिवासी बाहुल्य जिले  बैतूल में होने वाले संघ के अखिल भारतीय हिन्दू महासम्मेलन को समाजवादी जन परिषद (सजप) और श्रमिक आदिवासी संगठन (श्रआंस) ने मुख्यत: दलितों और आदिवासीयों को वापस अपनी तरफ खीचने की कयावाद बताते हुए उस पर कुछ सवाल उठाए है| आज जारी प्रेस वक्तव्य में सजप के राष्ट्रीय सचिव अनुराग मोदी और म. प्र. के उपाध्यक्ष राजेंद्र गढ़वाल और श्रआंस के सुमरलाल कोरकू ने कहा, सबसे पहले तो संघ इन दोनों समूहों को लेकर संघ अपनी वैचारिक  स्थिती स्पष्ट करे|
             आदिवासी हिन्दू नहीं है| हिन्दू मूर्ती पूजक होता है और आदिवासी तो प्रकुती पूजक है: वो पहाड़; जंगल; नदी की पूजा करता है| दूसरा, आदिवासी को हिन्दू समाज का हिस्सा बताने के पहले संघ यह बताए कि वो आदिवासी के विशेष दर्जे को नकारते हुए उसे  वनवासी बताने पर क्यों आमादा है? जब्कि, आदिवासी एक विशेष पहचान है| जिसे अंग्रेजों के समय ही, 1930 में, आदिवासी नेता और आई सी एस की नौकरी को त्यागकर ओलम्पिक हॉकी खिलाड़ी बने जयपाल मुंडा ने रखा था| जिसे हमारे सविंधान निर्माताओं ने इसे सविंधान में इसलिए जगह दी और इस विशेष सवैधानिक  पहचान के चलते ही आदिवासीयों को ना सिर्फ आरक्षण बल्कि सविंधान में विशेष दर्जा और संरक्षण दिया गया| क्योंकि, बाकी जातियां समय-समय पर इस देश में आई थी, वहीं आदिवासी समूह इसी देश के मूल  निवासी है| आदिवासी की इस विशेष पहचान को नकारकर उन्हें सिर्फ जंगल में रहने वाली जाती बताना ना सिर्फ आदिवासी समाज का अपमान है, बल्कि आदिवासी के विशेष दर्जे को छीनने की संघ की साजिश का हिस्सा है| क्योंकि,  वनवासी का मतलब है -  जंगल में निवास करने वाला कोई भी इन्सान|
    वहीं जबतक संघ मनु-स्मृती में दर्ज वर्णव्यवस्था के आधार पर बनी हिन्दू समाज की व्यवस्था को पूरी तरह से नकारकर, संघ सभी हिन्दू समाज बराबर है , इस व्यवस्था को अंगीकार नहीं करता, तबतक दलितों को हिन्दू बताने थोथा हल्ला है| संघ मनुस्मृती को मानता है, जिसे बाबा साहब आंबेडकर ने नाकारा था| इसलिए संघ में कभी भी किसी दलित को प्रचारक का दर्जा नहीं दिया जाता, या कोई प्रमुख पद नहीं दिया जाता|
हर धर्म को अपना अपना सम्मलेन और प्रचार करने का अधिकार है, लेकिन जब उसे एक राजनैतिक पार्टी के एजंडे के तहत किया जाता है, तो फिर उसमें धर्म के असली उपदेश काहीं बहुत पीछे छूट जाते है| इस ना वो धर्म आगे बढ़ता है और ना ही उस धर्म के मानने वाले| हाँ इससे सिर्फ इस तरह के सम्मेलनों से जुडी राजनैतिक पार्टी भर को फायदा होता है|
आज हिन्दू धर्म को संघ की कट्टरता की नहीं बल्कि  उदार और साझी परम्परा को समझ मानव समाज को बचाने की जरूरत है ना की वोट के नाम पर उन्हें लड़ाने की|
हिन्दू समाज में भक्ती आन्दोलन की उस उदार परम्परा की रही है, जिसे नौवीं सदी में शंकराचार्य ने जिस शुरुवात करी थी, जो बाद में संत तुकाराम, नानक, कबीर, मीराबा से लेकर रसखान कई सूफी संतों ने पोषा| जिस हिन्दू धर्म की परिभाषा स्वामी विवेकानंद से लेकर गांधीजी ने रखी उस सहिषुणता और गंगा-जमनी धर्म को मानने वाले उस हिन्दू धर्म की जरूरत है, जो हमें आपसी लड़ाई भुलाकर विकास के असली रास्ते पर ले जाए|

अनुराग मोदी 

Saturday, August 6, 2016

एक और सुनामी ( Aloka)

Add ca
एक और सुनामी 
आलोका 
उपन्यास - रह गयी दि’ाांए इसी पार, में उपन्यासकार संजीव जी ने भारतीय समाज के कई भाषा संस्कृति के साथ विदे’ाी भाषा के आगमन को तारम्तार से पात्रों को जोड़ा है। बदलती समाजिक, परिवारिक बदलाव में विज्ञान का जर्बस्त भूमिका को हिन्दी उपन्यास में पहली बार पढ़ने को मिला। जड़ी बूटी चिकित्सा, वैद्य और विज्ञान के साथ भारतीय समाज में मानसिकता का बदलाव में विज्ञान की भूमिका को काफी मजबूती से दिखाया है। भारत का समाज में विदे’ाी आगमन के साथ तमाम व्यवस्था को समाज में एक नये लूक को दर्’ााता है। यह उपन्यास कई मायने में महत्वपूर्ण है। छुपती पुरानी सामाजिक व्यवस्था और आगमन में नये वैज्ञानिक व्यवस्था सिर्फ काम काज में ही नहीं पूरे मानव जीवन में यह अपनी स्थान बना चुका है। महिलाओं के वैज्ञानिक सोच ने परिवार की चाहत में बदलाव को दिखाया। उपन्यास पढ़ने के क्रम में लगा की भारत के अन्दर वैज्ञानिक चेतना के साथ वैज्ञानिक परिवर्तन तो आया है। इस परिवर्तन से समाज में नयी समस्या और नये समाधान के कई नये रास्तें में पलायन कर महिलाओं की भूमिका को भूमिका दिखती। 
अलग अलग प्रांतों के अलग अलग सामाजिक परिवे’ा ने खोज की अपनी समझ को साफ तरीके से लिखना और पाठक को बताना एक बड़ी चुनौती है। तकनीकी विज्ञान का विकास ने मानव जीवन के कई खोजो को सरल बनाया  हैं। इस सरलता के साथ मानव के जरूरत और बदलेते परिवे’ा को यानि की सेक्स परिवर्तन और समलैगिंगता को कहानी में जगह मिली है। कुछ समय बात तक की कहानीयों में भारत के गांव के साथ परिवार के दृ’य को पढतें सुने को मिलता रहा है। जिसमें कई परम्परा के चादरों से ढका भारतीय समाज की कथा में यह उपन्यास लेखकों के लेखने के कई नये रास्ते खोलते हैं। चल रही समाजिक परिवर्तन की लहर ने कहानी में वो सब कुछ बदल दिया है जहां की राजनीति व्यवस्था ही बदल रहें है। छोटी- छोटी सामाजिक संगठनों के नेताओं की भूमिका और मुद्दों आधारित आंदोलन का स्वरूपों में महिलाओं नेतत्व का उद्भव को लेखक ने जीवन्त रूप में  लिखा है।
इट इज सिम्पली इम्पाॅसिबुल- में ’ााहनवाज को शहनाज तक के बनने प्रक्रिया में विज्ञान एक मात्र कारण नहीं रहा इसमें वहां के राजनीति व्यवस्था से लेकर अपने परिवार बचाने बनाये रखने में कुछ हद तक जिम्मेदार रहा है। ‘‘ एक छोटा सा अं’ा में’’  कटहल के काये- से- ठूंसे बदबू और सीलन भरे मकानों के बीच फंसा एक अदद मकान। हजार परिवारों के दलदल से उभरता छह जवान होती बेटियों और एक जवान बेटे ’ााहनवाज वाले जाकिर का एक अदद  परिवार।पार्टी का कार्यकर्ता बनकर ’ााहनवाज को एक नौकरी हासिल हुई- सम्प्लायमेंट एक्सचेंज की क्लर्की। जाकिर- परिवार के दिन अब दलदल से निकलने वाले थे कि वह दूसरे दलदल में जा फंसे। ’ााहनवाज औरतों- सी हरकतें करने लगा। आरिफ ने यह समस्या जिम को बतायी औ रजिम से ’ााहनवाज को अपने कंप्युटर में डाल  दिया। ’ााहनवाज को इस जिन्न से कौन छुडाएगा। बहुत पीर- दरगाह की बेटियों से यह खबर अम्मी तक अम्मी से अब्बा तक, सबसे पहले सझली बेटी कुलसूम ने देखा, फिर उसने अपनी बाकी बहनों के दिखाया, बहनों ने अपनी अम्मी को, किवाड़ की झिर्री पर चस्पा हो गई सात जोडी आंखे! अंदर ’ााहनवाज सलवार जंफर- चूड़ी, बिन्दी में औरत बना आलमारी के ’ाी’ो में अपने को निहार रहा था। अपने सीने को मसल रहा था, मुस्करा रहा था।
बंदिनी- लड़कियों का पलायन काम की तला’ा और प्राकृतिक द्वारा दिया मछली के उत्पादन में श्रमिकों का आना जाना गरीबी और पूंजी का अभाव से कई परिवार अपने जरूरत को पूरा करने जैसे कामों में लड़कियां और औरतों का पलायन काम की खोज और बेरोजगारी को दिखाता ये कहानी में पलायन कर जाने के बाद भी वहां किस हाल में लडकियां रहती है की व्यवस्था को दिखाता है। 
एक और सूनामी- में मछली के जूडे संगठनों के साथ एनजीओ की भूमिका को रेखाकिंत किया है कि समुद्र एक डस्टबिन हो गया है। कोस्टल रेगुलेटरी जोन पांच सौ किलो मीटर का सागर तट से पांच सौ मीटर के अंदर आप कोई निर्माण कार्य नहीं कर सकते लेकिन इसका उल्लधंन सर्वत्र है, खुद सरकार के हाथों ही दृ। आप यहांही देख लें, हारबर से भीमली तक विकास, आधुनिकीकरण और सुंदरीकरण के नाम पर सरकार ने जगह-जगह वायोलेट किया है। दूसरे, स्टील प्लांट, विद्युत उत्पादन और दूसरी इंडस्टीर का कचरा कहां गिरता तो समुद्र में पूरे ‘’ाहर का कचरा यहां कहां गिरेगा तो समुद्र में! मोटर निर्माण उद्योग, पर्यटन उद्योग, फिल्म उद्योग, आ रहे हैं। इनका कचरा भी समुद्र में ही आयेगा। मछलियां जिंदा रहें तो कैसे? मछलियां मरेंगी तो मछुआरे मरेंगे। वे भाग रहे हैं। अंडमान, भाग रहे है पुरी भाग रहे है। दूसरी जगह... से समुद्र बचाओं। समुद्र बचा तो मछलियां बचेंगी, मछलियां बचेंगी तो मछुआरे बचेंगे। जैसे घटना पर आंदोलन की औरतों की भूमिका और आंदोलन का मछुवाओं की आरपार की लडाई को इस किताब में जगह दिये है। 
302 पेज की यह उपन्यास ने भारत के अलग अलग प्रांतों के घटनाक्रम के साथ हर एक भूमिका को आंखों के सामने ऐसा उतारा कि उपन्यास पर सोचने को विव’ा करती है। यह उपन्यास की दुनिया का सुनामी ही तो है। मेरे जन्म दिन में रणेन्द्र जी ने संजीव जी के उपन्यास को पढने के यह किताब मुझे दिये। इसके लिए उपन्यासकार और रणेन्द्रे जी दोनों को धन्यवाद।। 

एक और सुनामी ( Aloka)

Add ca
एक और सुनामी 
आलोका 
उपन्यास - रह गयी दि’ाांए इसी पार, में उपन्यासकार संजीव जी ने भारतीय समाज के कई भाषा संस्कृति के साथ विदे’ाी भाषा के आगमन को तारम्तार से पात्रों को जोड़ा है। बदलती समाजिक, परिवारिक बदलाव में विज्ञान का जर्बस्त भूमिका को हिन्दी उपन्यास में पहली बार पढ़ने को मिला। जड़ी बूटी चिकित्सा, वैद्य और विज्ञान के साथ भारतीय समाज में मानसिकता का बदलाव में विज्ञान की भूमिका को काफी मजबूती से दिखाया है। भारत का समाज में विदे’ाी आगमन के साथ तमाम व्यवस्था को समाज में एक नये लूक को दर्’ााता है। यह उपन्यास कई मायने में महत्वपूर्ण है। छुपती पुरानी सामाजिक व्यवस्था और आगमन में नये वैज्ञानिक व्यवस्था सिर्फ काम काज में ही नहीं पूरे मानव जीवन में यह अपनी स्थान बना चुका है। महिलाओं के वैज्ञानिक सोच ने परिवार की चाहत में बदलाव को दिखाया। उपन्यास पढ़ने के क्रम में लगा की भारत के अन्दर वैज्ञानिक चेतना के साथ वैज्ञानिक परिवर्तन तो आया है। इस परिवर्तन से समाज में नयी समस्या और नये समाधान के कई नये रास्तें में पलायन कर महिलाओं की भूमिका को भूमिका दिखती। 
अलग अलग प्रांतों के अलग अलग सामाजिक परिवे’ा ने खोज की अपनी समझ को साफ तरीके से लिखना और पाठक को बताना एक बड़ी चुनौती है। तकनीकी विज्ञान का विकास ने मानव जीवन के कई खोजो को सरल बनाया  हैं। इस सरलता के साथ मानव के जरूरत और बदलेते परिवे’ा को यानि की सेक्स परिवर्तन और समलैगिंगता को कहानी में जगह मिली है। कुछ समय बात तक की कहानीयों में भारत के गांव के साथ परिवार के दृ’य को पढतें सुने को मिलता रहा है। जिसमें कई परम्परा के चादरों से ढका भारतीय समाज की कथा में यह उपन्यास लेखकों के लेखने के कई नये रास्ते खोलते हैं। चल रही समाजिक परिवर्तन की लहर ने कहानी में वो सब कुछ बदल दिया है जहां की राजनीति व्यवस्था ही बदल रहें है। छोटी- छोटी सामाजिक संगठनों के नेताओं की भूमिका और मुद्दों आधारित आंदोलन का स्वरूपों में महिलाओं नेतत्व का उद्भव को लेखक ने जीवन्त रूप में  लिखा है।
इट इज सिम्पली इम्पाॅसिबुल- में ’ााहनवाज को शहनाज तक के बनने प्रक्रिया में विज्ञान एक मात्र कारण नहीं रहा इसमें वहां के राजनीति व्यवस्था से लेकर अपने परिवार बचाने बनाये रखने में कुछ हद तक जिम्मेदार रहा है। ‘‘ एक छोटा सा अं’ा में’’  कटहल के काये- से- ठूंसे बदबू और सीलन भरे मकानों के बीच फंसा एक अदद मकान। हजार परिवारों के दलदल से उभरता छह जवान होती बेटियों और एक जवान बेटे ’ााहनवाज वाले जाकिर का एक अदद  परिवार।पार्टी का कार्यकर्ता बनकर ’ााहनवाज को एक नौकरी हासिल हुई- सम्प्लायमेंट एक्सचेंज की क्लर्की। जाकिर- परिवार के दिन अब दलदल से निकलने वाले थे कि वह दूसरे दलदल में जा फंसे। ’ााहनवाज औरतों- सी हरकतें करने लगा। आरिफ ने यह समस्या जिम को बतायी औ रजिम से ’ााहनवाज को अपने कंप्युटर में डाल  दिया। ’ााहनवाज को इस जिन्न से कौन छुडाएगा। बहुत पीर- दरगाह की बेटियों से यह खबर अम्मी तक अम्मी से अब्बा तक, सबसे पहले सझली बेटी कुलसूम ने देखा, फिर उसने अपनी बाकी बहनों के दिखाया, बहनों ने अपनी अम्मी को, किवाड़ की झिर्री पर चस्पा हो गई सात जोडी आंखे! अंदर ’ााहनवाज सलवार जंफर- चूड़ी, बिन्दी में औरत बना आलमारी के ’ाी’ो में अपने को निहार रहा था। अपने सीने को मसल रहा था, मुस्करा रहा था।
बंदिनी- लड़कियों का पलायन काम की तला’ा और प्राकृतिक द्वारा दिया मछली के उत्पादन में श्रमिकों का आना जाना गरीबी और पूंजी का अभाव से कई परिवार अपने जरूरत को पूरा करने जैसे कामों में लड़कियां और औरतों का पलायन काम की खोज और बेरोजगारी को दिखाता ये कहानी में पलायन कर जाने के बाद भी वहां किस हाल में लडकियां रहती है की व्यवस्था को दिखाता है। 
एक और सूनामी- में मछली के जूडे संगठनों के साथ एनजीओ की भूमिका को रेखाकिंत किया है कि समुद्र एक डस्टबिन हो गया है। कोस्टल रेगुलेटरी जोन पांच सौ किलो मीटर का सागर तट से पांच सौ मीटर के अंदर आप कोई निर्माण कार्य नहीं कर सकते लेकिन इसका उल्लधंन सर्वत्र है, खुद सरकार के हाथों ही दृ। आप यहांही देख लें, हारबर से भीमली तक विकास, आधुनिकीकरण और सुंदरीकरण के नाम पर सरकार ने जगह-जगह वायोलेट किया है। दूसरे, स्टील प्लांट, विद्युत उत्पादन और दूसरी इंडस्टीर का कचरा कहां गिरता तो समुद्र में पूरे ‘’ाहर का कचरा यहां कहां गिरेगा तो समुद्र में! मोटर निर्माण उद्योग, पर्यटन उद्योग, फिल्म उद्योग, आ रहे हैं। इनका कचरा भी समुद्र में ही आयेगा। मछलियां जिंदा रहें तो कैसे? मछलियां मरेंगी तो मछुआरे मरेंगे। वे भाग रहे हैं। अंडमान, भाग रहे है पुरी भाग रहे है। दूसरी जगह... से समुद्र बचाओं। समुद्र बचा तो मछलियां बचेंगी, मछलियां बचेंगी तो मछुआरे बचेंगे। जैसे घटना पर आंदोलन की औरतों की भूमिका और आंदोलन का मछुवाओं की आरपार की लडाई को इस किताब में जगह दिये है। 
302 पेज की यह उपन्यास ने भारत के अलग अलग प्रांतों के घटनाक्रम के साथ हर एक भूमिका को आंखों के सामने ऐसा उतारा कि उपन्यास पर सोचने को विव’ा करती है। यह उपन्यास की दुनिया का सुनामी ही तो है। मेरे जन्म दिन में रणेन्द्र जी ने संजीव जी के उपन्यास को पढने के यह किताब मुझे दिये। इसके लिए उपन्यासकार और रणेन्द्रे जी दोनों को धन्यवाद।। 

Monday, April 18, 2016

Himanshu Kumar लिखते हैं

-------------
छत्तीसगढ में सुरक्षा बलों द्वारा आदिवासियों पर किये गये अत्याचारों के हज़ारों मामलों में से कुछ मामलों को हमने कोर्ट में उठाया . हमारे द्वारा उठाया गया एक भी मामला आज तक झूठा नहीं पाया गया है . सरकार ने इन मामलों में जो कुछ भी बोला है वो सब झूठ साबित हो चुका है .अगर हमारे द्वारा उठाये गये सारे मामलों की जांच हो जाए तो रमन सिंह जेल में पहुँच जाएगा .लेकिन भारत में आदिवासी राजनैतिक तौर पर मज़बूत नहीं हैं .इनकी संख्या बिखरी हुई है .
आदिवासियों का नेतृत्व खुद को मिले हुए राजनैतिक पद को सरकार की कृपा मानता है इसलिये आदिवासियों पर होने वाले अत्याचारों के मामले में चुप रहता है .मैं सैंकडों आदिवासी नेताओं को जानता हूं जो इस पूरे आदिवासी विनाश को चुपचाप देख रहे हैं मैं अपनी बात को साबित करने के लिये तीन मामले सामने रख रहा हूं
पहला मामला माटवाडा का है . इस मामले में पुलिस ने सलवा जुडूम कैम्प में रहने वाले तीन आदिवासियों की चाकू से आँखें निकाल ली थीं और बाद में पत्थर से उनके सिर कुचल कर उन्हें मार डाला था . इस मामले को हम हाई कोर्ट में ले गये . इस मामले की जांच राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग ने की . मानवाधिकार आयोग ने हमारे आरोपों को सही माना . इस मामले में तीन पुलिस वाले अब जेल में हैं .
दूसरा मामला सिंगारम का है . इस मामले में पुलिस ने उन्नीस आदिवासी लड़के लड़कियों को घरों से खींच कर बाहर निकाला और फिर उन्हें गोली मार दी . लड़कियों के साथ बलात्कार कर के उन्हें चाकू घोंप कर मारा गया था . इस मामले को भी हम हाई कोर्ट में ले कर गये . मामला अभी भी कोर्ट में लटका हुआ है .

खरीदनेवाला मालामाल, पहाड़ के मालिक बन रहे कंगाल तीन से आठ हजार एकड़ बिक रहा पहाड़ (Jiveshranjan Singh)


- आठ हजार रुपये भी नहीं मिलते एक साथ
-दौड़ाते हैं दबंग, देते हैं जेल भेजने की धमकी
-बिचौलियों के हाथों लुट रहे सीधे-साधे पहाड़िया
-पहले थे जमीन के मालिक, अब करते हैं क्रसर पर मजदूरी
-पासबुक भी लीजधारकों ने रख लिया है
-कैसे होगी पर्यावरण की सुरक्षा
-कैसे बचेंगे आदिम जनजाति
-स्थानीय राजनीतिज्ञों ने भी साध रही है चुप्पी
-सरकार को भी लगा रहे चूना
साहिबगंज से लौट कर जीवेश
साहिबगंज जिले में महज तीन से आठ हजार रुपये में एक एकड़ पहाड़ लीज पर उपलब्ध है. यह पैसे भी एक साथ नहीं देने पर कोई पूछनेवाला भी नहीं. इस कारण साहिबगंज जिले के अधिकतर पहाड़ बदसूरत हो रहे. सैकड़ों की संख्या में जेसीबी और अन्य अत्याधुनिक मशीनें व भारी संख्या में लगे वैध-अवैध क्रसर पहाड़ को चकनाचूर कर रहे. लगातार चलती अॉटोमेटिक व सेमिअॉटोमेटिक मशीनों के कारण उड़ रहे धूल-कण व तेज आवाज से आसपास की खेती मारी जा रही. पेड़-पौधे सूख अौर फलरहित हो रहे, तो दूसरी अोर आसपास के ग्रामीण गंभीर बीमारी के शिकार हो रहे हैं. जिले के अधिकतर पहाड़ों का मालिकाना हक अंग्रेजों के जमाने से आदिम जनजाति पहाड़िया के पास है. सरकार की काेशिशों के बाद भी ये पहाड़ पर ही रहते हैं. इनमें अधिकतर के निरक्षर अौर सीधे होने का फायदा दबंगों ने बिचौलियों के माध्यम से उठाया है. नशा अौर दबाव के बल पर पहले दबंग पहाड़ का लीज करा लेते हैं. फिर शुरू होता अौर गरीब पहाड़िया का शोषण. घर, पहाड़ व इज्जत गंवा चुके पहाड़िया सुधार चाहते हैं, पर यह आसान नहीं. इस कारण वो परेशान हैं. जानकारों की माने, तो आज राज्य के कई प्रभावशाली लोगों ने भी यहां लीज ले रखा है. पहाड़िया परेशान हैं, पहाड़ लीज पर नहीं देते, तो दबंगों व बिचौलियों का कहर अौर दे देते हैं, तो सब कुछ नष्ट हो जाने का खतरा. अदरो पहाड़ के प्रधान बोबे पहाड़िया कहते हैं कि अब तो फंस गये. कोई बचानेवाला भी नहीं, तो बेलबदरी पहाड़ के रूपा पहाड़िया कहते हैं कि अब तो ठगा गये, अब मरने के सिवा कोई रास्ता नहीं. यहां के लीजधारक इतने पावरफुल हैं कि कई अधिकारियों का तबादला माह भर में इसलिए हो गया, क्योंकि उन्होंने अवैध क्रसरों व उत्खनन पर लगाम लगाने की कोशिश की थी. हाल ही में वर्तमान एसडीअो (ट्रेनी आइएएस) मृत्युजय वर्णवाल ने भी क्रसरों पर इस कारण रोक लगायी कि वो सभी अहर्ताअों को पूरा नहीं करते, पर चंद दिन के अंदर उन्हें पीछे हटना पड़ा. भूगर्भशास्त्री डॉ रणजीत कुमार सिंह कहते हैं साहिबगंज को दूसरा केदारनाथ बनाने में लगे हैं सब. जिले के चिकित्सक डॉ एके झा कहते हैं कि प्रदूषण के कारण यहां बीमारों की संख्या बढ़ी है. दूसरी अोर जिला प्रशासन भी इस मामले से अनजान नहीं, जिलाधिकारी उमेश प्रसाद सिंह कहते हैं कि उन्होंने पहाड़िया लोगों की स्थिति सुधारने की काफी कोशिश की है. उनके प्रयास से ही अब लीज की राशि तीन से आठ हजार रुपये प्रति साल हुई है. हर तीन वर्ष पर लीज के नवीकरण की भी सुविधा होगी. अन्य सुविधाओं को भी दिलवाने की बात वह कहते हैं. पर हालात इससे इतर हैं. जमीन के मालिक पहाड़िया अब क्रसरों पर काम कर जी रहे. जल्द इस पर काबू नहीं पाया गया, तो वो दिन दूर नहीं जब न पहाड़ रहेंगे अौर न पहाड़िया.
.....
बोरियो प्रखंड के लगभग सभी पहाड़ लीज पर
अकेले बोरियो प्रखंड में 50 से 60 क्रसर मशीनें चल रहीं. यहां के पहाड़ों में करम पहाड़, घोघी पहाड़, लोहंडा माको, तुभीटोला पहाड़, अठरो संथाली पहाड़, अठरो पहाड़ (पहाड़िया), पगाड़ो, तेतरिया, अंबाडीहा, चमठी, शहरबेड़ा, मोतीझरना पहाड़ (सकरी के पास), खुजली झरना पहाड़ (लोहंडा के पास), झिगानी पहाड़ व गदवा पहाड़ के अधिकतर हिस्से लीज पर लिये जा चुके हैं. कुछ लोगों ने अपने हिस्से लीज पर नहीं दिये हैं, पर वहां धूल के कारण वो कुछ कर भी नहीं सकते. 
.....
क्यों है पहाड़ पर पहाड़िया का अधिकार 
वरीय अधिवक्ता गौतम प्रसाद सिंह के अनुसार अंग्रेजों ने पहाड़ पर रहनेवाले पहाड़ियों के लिए जीविकोपार्जन के लिए पहाड़ों की रैयती उनको दे दी थी. उसी समय से साहिबगंज की पहाड़िया जनजाति वहां के पहाड़ों के रैयत हैं. पर पहाड़ के अंदर के चीजों (खनिज, पत्थर आदि) पर सरकार का अधिकार है. इस कारण पहाड़ों का लीज पहले उसके रैयत (पहाड़िया) से लेते हैं व्यवसायी. अंदर से पत्थर निकालने के लिए सरकार से भी करार करते हैं. जानकारों के अनुसार पहाड़िया से जमीन लेने के कारण सरकार से होनेवाले लीज में घपला होते रहता है.

कैसे ठगे जाते हैं पहाड़िया
जानकारों के अनुसार बाहर से आये व्यवसायी पहले स्थानीय बिचौलियों को अपने से मिलाते हैं अौर फिर उनके माध्यम से वैसे पहाड़िया परिवार को चिह्नित किया जाता है, जिनकी जमीन पहाड़ पर है. बिचौलिया झूठ-सच बातें समझाते हैं. नशे का भी शिकार बना दिया जाता है सीधे-साधे पहाड़िया लोगों को. यह भी बताते हैं कि पहाड़ पर कुछ होता नहीं, लीज पर देने से पैसे मिलेंगे. पहले किसी एक का लेने के बाद दूसरे पर दबाव बनाया जाता है. कई जगह तो जितनी जमीन लीज पर ली जाती है, उससे ज्यादा में उत्खनन किया जाता है. रोकने या कुछ कहने पर धमकी भी दी जाती है. बड़ी बात यह कि अधिकतर लोग उस व्यक्ति को नहीं जानते जिसे उन्होंने अपनी जमीन लीज पर दी है.
....
कहते हैं पीड़ित
अब मरना ही होगा : रूपा
बलबदरी पहाड़ पर रूपा पहाड़िया का घर है. उनके पास पहाड़ पर 107 बिगहा, 18 कट्ठा 14 धूर जमीन है. इन्होंने झांसे में आकर लगभग 10 बिगहा जमीन माइनिंग के लिए दे दी. आज बेहाल हैं रूपा पहाड़िया. उनको एक बेटा अौर एक बेटी है. दोनों क्रसर पर मजदूरी करते हैं. घर में पत्नी के साथ अकेले रहते हैं रूपा पहाड़िया. कहते हैं कि आठ हजार रुपये एकड़ प्रति वर्ष के हिसाब से लीज दिया था, पर पैसे एक साथ नहीं मिलते. बार-बार कहने पर कुछ-कुछ पैसे कर देते हैं लीज लेनेवाले. शेष जमीन भी बेकार हो गयी. फसल नहीं हो पाता. आम-जामुन के पेड़ भी बेकार हो गये. कहते हैं कि उनकी सुध लेनेवाला कोई नहीं. लीज लेनेवाले एक एकड़ लिखवाते हैं अौर उससे ज्यादा में उत्खनन करते हैं. कभी अपनी खेती थी, अब दूसरे का खेत बंटाई पर बोते हैं. कहते हैं कि उनके पिता केशव पहाड़िया ने पहले 1200 रुपये प्रति वर्ष के हिसाब से लीज पर दिया था. इस वर्ष उन्होंने सात साल के लीज पर दिया है. क्यों लीज पर देते हैं, पूछने पर कहते हैं कि अब तो सब बरबाद हो गया, नहीं देंगे तो भी तो कुछ पैदा नहीं होगा. बीमार रूपा को इस बात का भी रोष है कि सरकारी अस्पताल में उन्हें दवा नहीं मिलती. कहा जाता है कि बाहर से खरीद लो. पासबुक दिखाने की बात कहने पर कहते हैं कि वो तो लीजधारक ने ही रख लिया है. अब उन्हें पता भी नहीं चलता कि कितने पैसे उनके खाते में आये.
....
पैसे मांगे तो जेल भेज दिया : सुकरा
रूपा पहाड़िया का बेटा है सुकरा पहाड़िया. कहता है कि पैसे नहीं देने पर जब वह शिकायत करने गया, तो उसकी नहीं सुनी गयी. इस पर उसने काम रोक दिया, तो उस पर तरह-तरह का आरोप लगा कर उसे जेल भेज दिया गया. आर्मस एक्ट सहित कई मामले उस पर लगा कर उसे पिता के साथ जेल भेज दिया गया. नाराज सुकरा कहता है कि अब तो पैसे मांगना भी गुनाह है.
....
पहाड़ देकर खुश नहीं : बोबे पहाड़िया
बोड़ियो प्रखंड के बड़ा तोफिर पंचायत का गांव है अदरो. पहाड़िया बहुल इस गांव में 33 घर हैं. यहां के 12 लोगों ने लीज पर पहाड़ दिया है. अन्य इलाको की अपेक्षा साक्षर इस गांव को तत्कालीन उपायुक्त के रविकुमार ने गोद भी लिया था. वर्तमान उपायुक्त उमेश प्रसाद सिंह भी गांव में गये थे अौर वहां कंबल बांटा था. यहां के पहाड़िया नशा नहीं करते. यहां के प्रधान बोबे पहाड़िया के अनुसार पहाड़ पर खेती करने में दिक्कत होती थी. वन विभाग ने भी वर्षों पहले पौधरोपण किया था, पर कोई फायदा नहीं हुआ. फिर बिचौलियों ने समझाया अौर महज पांच हजार सालाना पर इन्होंने दो एकड़ जमीन लीज पर दे दिया. किसको दिया पूछने पर कहते हैं कि किसी वकील साहब को दिया है. पैसे मिलते हैं या नहीं पूछने पर कहते हैं कि काफी दिक्कत है. एक साथ पांच हजार नहीं मिलते. कभी-कभी कुछ कुछ पैसे दे कर या होली-दिवाली में दो-चार सौ रुपये देकर पांच हजार पूरे कर दिये जाते हैं. 
.....
काश लीज कैंसिल करा सकता : रामा
अदरो के ही रामा पहाड़िया ने मैट्रिक अौर आइटीआइ (इलेक्ट्रीकल) भी किया है. 11 लोगों ने इनकी 29 बिगहा जमीन लीज पर ली है. वो 12000 हजार रुपये सालाना देते हैं, पर रामा को कभी भी एकमुश्त राशि नहीं मिली. कहते हैं कि घर में कोई बीमार भी हो जाये, तो लीज लेनेवाले लोग पैसे नहीं देते. लीज लेने से पहले प्यार करते हैं अौर लेने के बाद दुत्कारते हैं. व्यवस्था से नाराज रामा ने कहा कि वह लीज कैंसिल करना चाहते हैं, पर नहीं कर पाते. उनके पास पैसे नहीं हैं. लोन के लिए काफी कोशिश की, राष्ट्रपति तक गये, पर कुछ नहीं मिला. कहते हैं कि कोई एक लाख रुपये दे दे तो वो कुछ कर के दिखा दें. राज्य सरकार से भी खफा हैं रामा. कहते हैं कि वर्षों से पहाड़िया बटालियन के बनने की बात सुनता था, पर आज तक कुछ नहीं हुआ. वो कहते हैं कि कोई कुछ नहीं करेगा. गरीब को गरीब ही रहना है. 
....
पांच हजार मुंडा परिवार परेशान
बड़ा तोफी पंचायत के पूर्व मुखिया वीर कुमार मुंडा कहते हैं कि पहाड़ के तलहटी में क्रसर लगाने के लिए तीन हजार सालाना पर जमीन लीज पर देने के बाद से वहां के पांच हजार मुंडा परिवार परेशान हैं. श्री मुंडा कहते हैं कि धूल-कण व आवाज से सब परेशान हैं. खेती मर गयी अौर बीमारी बढ़ गयी है. 
.....
कई सुविधाएं दिलायी : डीसी
जिलाधिकारी उमेश प्रसाद सिंह कहते हैं कि उन्होंने पहाड़िया लोगों के लिए काफी कुछ किया है. वो खुद उनके पास जाते हैं. लीज की राशि भी तीन हजार से बढ़ा कर आठ हजार रुपये प्रति वर्ष कराया है. यह भी व्यवस्था की है कि हर तीन वर्ष पर लीज का नवीकरण हो. इसके साथ ही रैयतों को लीजधारकों द्वारा अन्य सुविधाएं भी दिलाने की शर्त तय करायी है. वो कहते हैं कि अगर इसका कहीं उल्लंघन हो रहा तो कानूनी कार्रवाई होगी.
.....
कोई नियम तो तय हो : डॉ सिंह
साहिबगंज कालेज के भूगर्भ शास्त्र विभाग के सहायक प्रध्यापक डॉ रणजीत कुमार सिंह कहते हैं कि साहिबगंज में नियमों की धज्जी उड़ायी गयी हैं. प्राकृतिक संतुलन गड़बड़ होना तय है. वैसे पहाड़ों को भी काटा जा रहा है, जिनमें सिर्फ मिट्टी है. डॉ सिंह कहते हैं कि हम सब मिल कर साहिबगंज को दूसरा केदारनाथ बना रहे हैं.
....
बीमारी बढ़ी है : डॉ झा
प्रदूषण के कारण बीमारों की संख्या बढ़ने की बात कहते हैं फीजिसियन डॉ एके झा. कहते हैं कि जिले में क्षय रोग, बहरापन, चिड़चिड़ापन, चर्मरोग व अन्य तरह की समस्याएं बढ़ी हैं. 
.....
कितना है माइनिंग व क्रसर का लीज
साहिबगंज जिले में माइनिंग के लिए 267 व क्रसर के लिए 287 लोगों ने लीज लिया है. इसके अलावा अवैध रूप से भी माइनिंग करने व क्रसर चलानेवाले सैकड़ों की संख्या में हैं. मिर्जाचौकी, कोदरजन्ना, महादेवगंज, साहिबगंज, आइटीआइ पहाड, सकरीगली, महाराजपुर, करणपुरातो, तालझारी, तीनपहाड़, बाकुड़ी, पतना, बरहड़वा, कोटालपोखर व राजमहल में अवैध रूप से सैकड़ों क्रशर चल रहे हैं. इनका लेखा-जोखा कहीं भी नहीं है. 
.....
क्यों यह इलाका है पहली पसंद
संथालपरगना का साहिबगंज व पाकुड़ जिले का स्टोन चिप्स काफी पसंद किया जाता है. खास कर यहां के काला पत्थर की क्वालिटी काफी अच्छी है. दूसरी ओर भौगोलिक दृष्टिकोण से भी यह इलाका पसंद किया जाता है. यहां से बंगाल व बिहार की सीमा सटी हुई है. इससे वैध-अवैध माल इधर से उधर करने में आसानी होती है. इसके अलावा रेल की सुविधा है. झारखंड का उपेक्षित, गरीब व कम साक्षर जिला होने के कारण भी अवैध काम करनेवालों को यहां सुविधा होती है.
कैसे खेती योग्य जमीन हो गयी बरबाद
पहाड़ की तलहटी की जमीन उपजाऊ है. पर खनन के बाद पत्थर व मिट्टी नीचे तलहटी में ही डंप करते हैं सब. इस कारण नीचे की जमीन बंजर हो गयी. दूसरी अोर धूल के कारण भी सभी फलदार पेड़ व तलहटी से दूर के खेत भी बरबाद हो गये. 
...
क्या है नियम
लीज व क्रशर के लिए नियमों की सूची लंबी है. सबसे पहले जमीन चिन्हित कर उसका एग्रिमेंट कर उसकी रसीद संबंधित प्रखंड के सीओ के पास आवेदन के साथ जमा करनी होती है. सीअो जमीन की प्रकृति तय (किसकी जमीन है अौर कैसी है) कर उसे डीएफओ को भेजता है. डीएफओ यह तय करता है कि उस जमीन को लीज पर देने से वन भूमि या क्षेत्र या पेड़ काे नुकसान तो नहीं होगा. इसके बाद पर्यावरण विभाग, रांची से उसे लीज पर देने की स्वीकृति मांगी जाती है. सभी जगह से एनओसी मिलने के बाद सीओ उसे जिला खनन पदाधिकारी के पास भेजता है. वहां से पास होने के बाद आवेदन डीसी के पास भेजा जाता है. इस प्रक्रिया में 70 हजार से एक लाख रुपये तक का खर्च आता है. हालांकि जानकार कहते हैं कि खर्च की राशि बढ़ा देने से सभी जांच कागजों पर ही हो जाता है. 
क्या कहते हैं लीजधारक
जिला पत्थर व्यवसायी संघ के सचिव चंदेश्वर प्रसाद सिन्हा उर्फ बोदी सिन्हा के अनुसार सभी लीजधारक नियमों को पूरा करते हैं. उनके अनुसार पर्यावरण विभाग व अन्य विभागों से एनओसी के लिए काफी दिक्कत का सामना करना पड़ता है. श्री सिन्हा के अनुसार प्रशासन के सहयोग से काम हो रहा है .
कहते हैं जिला खनन पदाधिकारी
जिला खनन पदाधिकारी फेंकू राम के अनुसार खनन से आनेवाले राजस्व के मामले में साहेबगंज जिला आगे है. उन्होंने फोन पर बताया कि समय-समय पर अवैध क्रशर व खदान के खिलाफ छापामारी कर कार्रवाई की जाती रही है. किसी को गलत करने की इजाजत नहीं है.

Tuesday, March 22, 2016

स्त्री श्रम का सौंदर्य’ाास्त्र


आलोका रांची से 
स्त्री श्रम का सौंदर्य’ाास्त्र। इस विषय पर कुछ भी लिखने से पहले हमें ‘स्त्री श्रम’ और ‘सौंदर्य’ाास्त्र’ को अलग-अलग समझने की जरूरत है। किसी भी क्षेत्र में स्त्रियों द्वारा किए जाने वाले श्रम को ही ‘स्त्री श्रम’ कहा जा सकता है। ‘सौंदर्य’ाास्त्र’ पर बात करें तो     सौंदर्य, कला, कल्पना, बिंब व प्रतीक इसके तत्व हैं। इसका उल्लेख हिंदी साहित्य में मिलता है। 
अब इसे समझ लेने के बाद हम ‘स्त्री श्रम का सौंदर्य’ाास्त्र’ विषय पर चर्चा कर सकते हैं। उपरोक्त तथ्यों के आधार पर यह कहा जा सकता है कि जीवन के हर पहलू में स्त्रियों की स्वतंत्रता, समता एवं प्रगति ही स्त्री श्रम का सौंदर्य’ाास्त्र है। सामाजिक जीवन में स्त्रियों की स्वतंत्र एवं समान भागीदारी से  हो रही चातुर्दिक प्रगति में सौंदर्य की आभा भी है और कला की खनक भी। कल्पना की उड़ान भी है और बिंब व प्रतीक की झलक भी। इन्हें स्त्री श्रम के विविध रूपों में देखा-समझा भी जा सकता है।
   खेत में धान रोपती स्त्री, पहाड़ पर पत्थर तोड़ती स्त्री, कमर पर घड़ा लिए पनघट से लौटती स्त्री, अपनी कल्पना को कैनवास पर उतारती स्त्री, किसी दफ्तर में कंप्यूटर और मौस के बीच उलझी स्त्री, खेल के मैदान में उछलती-कूदती स्त्री या युद्धाभ्यास में पसीना बहाती स्त्री। स्त्री श्रम के इन विविध रूपों में ही तो निहित है स्त्री श्रम का सौंदर्य’ाास्त्र। आज के आधुनिक युग में तो स्त्री श्रम के सौंदर्य’ाास्त्र का दायरा और भी बढ़ गया है। कभी चहारदिवारियों के मध्य टिमटिमाने वाला स्त्री श्रम का यह सौंदर्य अब दे’ा-दुनिया के कोने-कोने में अपनी अभा बिखेर रहा है। स्त्रियों के इस सौंदर्य से पूरा जगत चकाचैंध हो रहा है। कृषि से कारोबार तक, बाजार से दफ्तर तक, मीडिया से राजनीति तक, सामाजिक विकास के संघर्ष से रणक्षेत्र के सरहद तक, तकनीक की दुनिया से खेल के मैदान तक और कला की जमीन से कलाबाजी के आकास तक। ’ाायद ही कोई कोना ऐसा हो, जहां स्त्री श्रम के सौंदर्य की किरण नहीं पहुंची है। 
जहिर है कि हमारे समाज में स्त्री श्रम का सौंदर्य अदभुत और अनोखा है। पर हकीकत यह है कि अब भी स्त्री श्रम को वो मूल्य हासिल नहीं है, जो पुरूषों को है। आज भी दुनिया के कई इलाकों में स्त्री श्रम को मान्यता नहीं दी गई है। जहां दी भी गई, वहां यह बहुत सस्ता है। जहां स्त्री श्रम को मान्यता नहीं है, वहां इसका का महत्व भी नहीं है। स्त्रियां मुख्य रूप से दो तरह का श्रम करती हैं। एक तो ये घर परिवार चलाने के लिए श्रम करती हैं और दूसरे में ये राज्य व समाज के विकास के लिए भी योगदान देती हैं। अगर कोई स्त्री दफ्तर में बैठकर फाइलें निपटाती हैं, तो वह भी श्रम करती हैं और कोई स्त्री खेतों में पसीने बहाती हैं, तो वह भी श्रम ही करती हैं। दफ्तर में बैठकर श्रम करने वाली स्त्री को उनके श्रम का मूल्य तो मिलता है, लेकिन खेतों में काम करने वाली महिलाओं को अब भी श्रम के बदले मूल्य नहीं मिलता। खेतों में काम करना हमारे यहां की औरतों के लिए जैसी उसकी नियति बन गई है। पूरी दूनिया में घरेलू श्रम सबसे ज्यादा स्त्री ही करती हैं। लेकिन इसका ‘वैल्यू’ भी घरों तक ही सीमित है। इसे स्त्रियों का श्रम नहीं,  सिर्फ सेवा भाव समझा जाता है। भारत में बड़ी संख्या में महिलाएं कृषि कार्य में हाथ बंटाती हैं। ये दिन रात खेतों में काम करती हैं और फसलों के उत्पादन में अहम भूमिका अदा करती हैं। लेकिन अबतक इन्हें स्त्री किसान का दर्जा हासिल नहीं है। दे’ा के अलग-अलग हिस्से में भारी संख्या में स्त्रियां अलग-अलग पे’ो से जुड़ी हैं, पर इन्हें भी उनके श्रम के बदले अपेक्षित मूल्य नहीं मिलता है। ऐसी स्त्रियों में बीड़ी बनाने वाली महिलाएं, अगरबत्ती-मोमबत्ती के रोजगार से जुड़ी महिलाएं, नर्स के रूप में काम करने वाली महिलाएं, बकरी पालन, भेड़ पालन, मुर्गी पालन व सुअर पालन के धंधे में लगी महिलाएं शामिल हैं। ये महिलाएं जीतोड़ श्रम करने के बाद भी गरीब और मजबूर हैं। इन्हें दो जून की रोटी भी नसीब नहीं होती। ऐसी स्त्रियां आज भी गुलामी की जंजीरों से जकड़ी हुई हैं।  

सबसे दुखद बात तो यह है कि स्त्री श्रम और उसके मूल्य को लेकर आज कहीं भी बहस नहीं चल रही है। जबकि श्रम के क्षेत्र में स्त्रियों की संख्या लगातार बढ़ रही है। ये स्त्रियां श्रम तो कर रही हैं, लेकिन इसके बदले वाजिब मूल्य के लिए न कोई सवाल खड़ा कर रही हैं और न ही कोई आंदोलन कर रही हैं। इसकी सबसे बड़ी वजह महिला श्रमिकों का असंगठित होना है। इन्हें संगठित करने के लिए ट्रेड युनियन भी अपनी भूमिका का निर्वाह नहीं कर पा रहे हैं। स्त्री मुक्ति की बात तो आंदोलन बना, लेकिन स्त्री श्रम का मुद्दा आज भी आंदोलन की शक्ल अख्तियार नहीं कर पाया। स्त्री श्रम का मुद्दा बहस का विषय भी नहीं बना। परिवार और पलायन के बीच स्त्री श्रम दुनिया के कोने-कोने में बिकता रहा, लेकिन इसका मूल्य का हिसाब नहीं लगा। 21वीं सदी के श्रमिक स्त्रीकाल में आज भी सरकार के विभाग में स्त्री का स्थान सुनि’िचत नहीं है। स्त्री श्रम का सौंदर्य’ाास्त्र तब और समृद्ध और व्यापक होगा, जब दे’ा के हर तबके की स्त्रियों को उनके श्रम का वाजिब मूल्य मिलने लगेगा। स्त्रियों को अपने श्रम का वाजिब मूल्य हासिल करने के लिए संघर्ष का रास्ता अख्तियार करना होगा।  


स्त्री श्रम कानून


आलोका

यू तो दुनिया में स्त्री श्रम की मान्या कई क्षेत्रों में नहीं दिया गया जहां मान्यता दिया भी गया है वहां श्रम सस्ता है। जहां मान्यता नहीं वहां स्त्री श्रम का महत्व सेवा भाव के साथ जूड़ जाता रहा हैै। जैसे पूरी दूनिया में घरेलू श्रम सबसे ज्यादा स्त्री ही करती है जिसका मूल्य निधारित नहीं उसे समाज में सेवा के भाव से जोड़ दिया गया है। वही किसान स्त्री दिन रात खेतों में काम करती है उनके काम को श्रम का मान्यता प्राप्त नहीं है। यह स्थिति पूरे भारत में आज भी विधामान है 
श्रमिक कौन है? उनकी जरूरत क्या है? जिसने अपने श्रम के बदले मूल्य लिया है। उनकी जरूरत श्रम और बदले में जरूरत की पूर्ति वह भी परिवार को चलाने के लिए जहां भूख और गरीबी दोनों स्त्री के जीवन में समाहित है। स्त्री, श्रम परिवार चलाने के लिए करती है। वो दो तरह के श्रम करती है। एक वह जो श्रमदान अपने परिवार का भरण पो’ाण के लिए करती है। दूसरा वह जो समाज और राज्य के विकास में अपना योगदान दे रही है। इन दोनों में स्त्री श्रम गुलामी के चक्रव्यूह में कैद है। 
दुनिया में म”ाीनी यूग का प्रेव”ा से स्त्रियों के जीवन में थोड़ी आजादी मिली है पर उसके सामने गरीबी, भूख, बेरोजगारी जैसे समस्या सामने लगातार बनी रही है। ऐसे स्थिति में स्त्री को श्रम करना एक मजबूरी बनाता है। वही तकनीकि विकास का असर यह हुआ कि स्त्री को संस्ती श्रम के साथ खड़ा किया गया है। जिसमें वें अपने जरूरत कि चीजे तक पूरी नहीं कर पा रही है और न काम का घंटा ही तय कर पा रहे है। 
वर्ततमान में स्त्री श्रम को लेकर कही भी बहस नहीं चल रहा है। जबकि तेजी से स्त्रियों के श्रम के क्षेत्र में लाया गया है। सबसे बड़ी आबादी के स्त्री श्रम के साथ जुडी हूई हैै। इन श्रमिक स्त्री ने अपने सवाल के साथ कभी आंदोलन का रूख अपनाया नहीं कारण कि जिन जिन क्षेत्र में स्त्री श्रम की बहुतायता है वह क्षेत्र असंगठित रहा है जहां टेड युनियन की बु तक नहीं आती है। स्त्री आंदोलन कि खासीयत यह रही कि स्त्री मुक्ति की बात अंादोलन का मुद्दा बना पर श्रमिक स्त्री की समस्याएं बहस का वि’ाय नहीं बन पाया   परिवार और पलायन के बीच श्रम दूनिया के कौने कौने में बिकती रही जिसमें आधी आबादी का श्रम का माप-जोख कही दिखता नहीं है। दुनिया में श्रमिकों के कई आंदोलन गरजे पर इस गरजन में स्त्री की  बात कही छुआ तक नहीं। 21वीं सदी के श्रमिक स्त्रीकाल में आज भी सरकार के विभाग में स्त्री का स्थान सुनि”चत नहीं है। जबकि कई बहुरा’टीय कम्पनी जैसे पत्थर खदान, बीडी कम्पनी, निर्माण मजदूर जैसे अनेकों स्थान में स्त्री श्रम के बल पर विकास के काम कर रहीं है और यह पूरा का पूरा क्षेत्र असंगठित श्रमिका का एक बड़ा तपका आज भी हमारे सामने अपने अधिकार और श्रम के वास्तिवक मूल्य पर आवाज बुलंद नहीं कर पा रहा है।इसके अलावे घरेलू कामगार श्रमिक स्त्री नर्स के रूप में काम कर रही स्त्री की संख्या आज भी बरकरार है। 
60 के द”ाक से स्त्रीयों के श्रम बेचने के लिए मजबूर होती रही। यह वह वक्त है जब स्त्रीयां अपने श्रम को बेचने के लिए घर से बाहर आई। जिसमें गांव से निकल कर काम करने वाली स्त्री की संख्या में तेजी से विकास हुआ। विकास के अंधी दौड़ में किसान महिला श्रमिक बेरोगार होते चले गये। उनका श्रम का मूल्यबोध बदलता चला गया और स्त्रियों के जीवन में श्रम एक संक्रामक के रूप में उपस्थिति हो गया। सही वह समय है  जब तेजी से दुनिया में नये व्यवस्था का दौर “ाुरू हुआ जिससे सस्ती श्रम के प्रति स्त्री को टारगेट किया जाने लगा। हर जिले में प्राकृतिक संसाधनों पर लूट और उनका उधोग के रूप का बदलना कम्पनी का पैदा होना के साथ स्त्री के श्रम का वेलू बढ़ना अब तक जारी है। 
श्रमिकों के कानून है - कानून श्रमिकों के बने है पर वह श्रम मंत्रालय या श्रम विभाग तक ही समाहित है। दे”ा के किसी कोने के श्रमिकों से उनके कानून के बारे में जानकारी ले किसी भी श्रमिक को जो असंगठित क्षेत्र से उन्हें अपने अधिकार के बारे में नहीं जानते। 
टेड यूनियन “ाुन्य काल में- कम्पनी में पुरू’ाों कि नियूक्ति तेजी से होते रहे है भारत के आजादी के बाद स्त्री श्रमिकों के लिए स्थान सुरक्षित आज तक नहीं हो पाई है। वे आज भी रोज का कमाना रोज का खाना वाली प्रक्रिया में जूडे हुए है। इनका टेड यूनियन से किसी प्रकार का नाता रि”ता नहीं रहा और न टेड यूनियन को इनसे कोई मतलब रहा। टेड यूनियन का मतलब बड़ी कम्पनी या फैक्टी पर काम करने वाले मजदूरों के साथ ही संबध बना रहा।