Saturday, August 6, 2016

एक और सुनामी ( Aloka)

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एक और सुनामी 
आलोका 
उपन्यास - रह गयी दि’ाांए इसी पार, में उपन्यासकार संजीव जी ने भारतीय समाज के कई भाषा संस्कृति के साथ विदे’ाी भाषा के आगमन को तारम्तार से पात्रों को जोड़ा है। बदलती समाजिक, परिवारिक बदलाव में विज्ञान का जर्बस्त भूमिका को हिन्दी उपन्यास में पहली बार पढ़ने को मिला। जड़ी बूटी चिकित्सा, वैद्य और विज्ञान के साथ भारतीय समाज में मानसिकता का बदलाव में विज्ञान की भूमिका को काफी मजबूती से दिखाया है। भारत का समाज में विदे’ाी आगमन के साथ तमाम व्यवस्था को समाज में एक नये लूक को दर्’ााता है। यह उपन्यास कई मायने में महत्वपूर्ण है। छुपती पुरानी सामाजिक व्यवस्था और आगमन में नये वैज्ञानिक व्यवस्था सिर्फ काम काज में ही नहीं पूरे मानव जीवन में यह अपनी स्थान बना चुका है। महिलाओं के वैज्ञानिक सोच ने परिवार की चाहत में बदलाव को दिखाया। उपन्यास पढ़ने के क्रम में लगा की भारत के अन्दर वैज्ञानिक चेतना के साथ वैज्ञानिक परिवर्तन तो आया है। इस परिवर्तन से समाज में नयी समस्या और नये समाधान के कई नये रास्तें में पलायन कर महिलाओं की भूमिका को भूमिका दिखती। 
अलग अलग प्रांतों के अलग अलग सामाजिक परिवे’ा ने खोज की अपनी समझ को साफ तरीके से लिखना और पाठक को बताना एक बड़ी चुनौती है। तकनीकी विज्ञान का विकास ने मानव जीवन के कई खोजो को सरल बनाया  हैं। इस सरलता के साथ मानव के जरूरत और बदलेते परिवे’ा को यानि की सेक्स परिवर्तन और समलैगिंगता को कहानी में जगह मिली है। कुछ समय बात तक की कहानीयों में भारत के गांव के साथ परिवार के दृ’य को पढतें सुने को मिलता रहा है। जिसमें कई परम्परा के चादरों से ढका भारतीय समाज की कथा में यह उपन्यास लेखकों के लेखने के कई नये रास्ते खोलते हैं। चल रही समाजिक परिवर्तन की लहर ने कहानी में वो सब कुछ बदल दिया है जहां की राजनीति व्यवस्था ही बदल रहें है। छोटी- छोटी सामाजिक संगठनों के नेताओं की भूमिका और मुद्दों आधारित आंदोलन का स्वरूपों में महिलाओं नेतत्व का उद्भव को लेखक ने जीवन्त रूप में  लिखा है।
इट इज सिम्पली इम्पाॅसिबुल- में ’ााहनवाज को शहनाज तक के बनने प्रक्रिया में विज्ञान एक मात्र कारण नहीं रहा इसमें वहां के राजनीति व्यवस्था से लेकर अपने परिवार बचाने बनाये रखने में कुछ हद तक जिम्मेदार रहा है। ‘‘ एक छोटा सा अं’ा में’’  कटहल के काये- से- ठूंसे बदबू और सीलन भरे मकानों के बीच फंसा एक अदद मकान। हजार परिवारों के दलदल से उभरता छह जवान होती बेटियों और एक जवान बेटे ’ााहनवाज वाले जाकिर का एक अदद  परिवार।पार्टी का कार्यकर्ता बनकर ’ााहनवाज को एक नौकरी हासिल हुई- सम्प्लायमेंट एक्सचेंज की क्लर्की। जाकिर- परिवार के दिन अब दलदल से निकलने वाले थे कि वह दूसरे दलदल में जा फंसे। ’ााहनवाज औरतों- सी हरकतें करने लगा। आरिफ ने यह समस्या जिम को बतायी औ रजिम से ’ााहनवाज को अपने कंप्युटर में डाल  दिया। ’ााहनवाज को इस जिन्न से कौन छुडाएगा। बहुत पीर- दरगाह की बेटियों से यह खबर अम्मी तक अम्मी से अब्बा तक, सबसे पहले सझली बेटी कुलसूम ने देखा, फिर उसने अपनी बाकी बहनों के दिखाया, बहनों ने अपनी अम्मी को, किवाड़ की झिर्री पर चस्पा हो गई सात जोडी आंखे! अंदर ’ााहनवाज सलवार जंफर- चूड़ी, बिन्दी में औरत बना आलमारी के ’ाी’ो में अपने को निहार रहा था। अपने सीने को मसल रहा था, मुस्करा रहा था।
बंदिनी- लड़कियों का पलायन काम की तला’ा और प्राकृतिक द्वारा दिया मछली के उत्पादन में श्रमिकों का आना जाना गरीबी और पूंजी का अभाव से कई परिवार अपने जरूरत को पूरा करने जैसे कामों में लड़कियां और औरतों का पलायन काम की खोज और बेरोजगारी को दिखाता ये कहानी में पलायन कर जाने के बाद भी वहां किस हाल में लडकियां रहती है की व्यवस्था को दिखाता है। 
एक और सूनामी- में मछली के जूडे संगठनों के साथ एनजीओ की भूमिका को रेखाकिंत किया है कि समुद्र एक डस्टबिन हो गया है। कोस्टल रेगुलेटरी जोन पांच सौ किलो मीटर का सागर तट से पांच सौ मीटर के अंदर आप कोई निर्माण कार्य नहीं कर सकते लेकिन इसका उल्लधंन सर्वत्र है, खुद सरकार के हाथों ही दृ। आप यहांही देख लें, हारबर से भीमली तक विकास, आधुनिकीकरण और सुंदरीकरण के नाम पर सरकार ने जगह-जगह वायोलेट किया है। दूसरे, स्टील प्लांट, विद्युत उत्पादन और दूसरी इंडस्टीर का कचरा कहां गिरता तो समुद्र में पूरे ‘’ाहर का कचरा यहां कहां गिरेगा तो समुद्र में! मोटर निर्माण उद्योग, पर्यटन उद्योग, फिल्म उद्योग, आ रहे हैं। इनका कचरा भी समुद्र में ही आयेगा। मछलियां जिंदा रहें तो कैसे? मछलियां मरेंगी तो मछुआरे मरेंगे। वे भाग रहे हैं। अंडमान, भाग रहे है पुरी भाग रहे है। दूसरी जगह... से समुद्र बचाओं। समुद्र बचा तो मछलियां बचेंगी, मछलियां बचेंगी तो मछुआरे बचेंगे। जैसे घटना पर आंदोलन की औरतों की भूमिका और आंदोलन का मछुवाओं की आरपार की लडाई को इस किताब में जगह दिये है। 
302 पेज की यह उपन्यास ने भारत के अलग अलग प्रांतों के घटनाक्रम के साथ हर एक भूमिका को आंखों के सामने ऐसा उतारा कि उपन्यास पर सोचने को विव’ा करती है। यह उपन्यास की दुनिया का सुनामी ही तो है। मेरे जन्म दिन में रणेन्द्र जी ने संजीव जी के उपन्यास को पढने के यह किताब मुझे दिये। इसके लिए उपन्यासकार और रणेन्द्रे जी दोनों को धन्यवाद।। 

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